कुछ अच्छा कर देते हो तुम…
और जब प्रेम से बातें करता हूँ,
कुछ गड़बड़ कर देते हो तुम…
ऐसा क्यों, शिव?
क्या मेरा प्रेम झूठा
और मेरा ग़ुस्सा सच्चा लगता है तुम्हें?
हाँ… लगता भी होगा।
प्रेम में तो मैं ख़ुद ही
कुछ गड़बड़ कर देता हूँ,
और फिर उसे ठीक करवाने
आ जाता हूँ तुम्हारे पास—
बिल्कुल स्वार्थी बनकर।
और ग़ुस्से में…
“तुमने ही तो गड़बड़ की है”
कहकर चिल्लाता रहता हूँ—
बिल्कुल एक बच्चे की तरह।
अगर मांगू मैं
एक और आशीर्वाद, प्रेम से…
तो क्या इस बार तूम **तथास्तु?** कहोगे—
मुझे बना देना, शिव—
बिल्कुल उस बच्चे जैसा—
जो प्रेम बाँटता रहे,
ग़ुस्सा करना भूल जाए…
मुझे ऐसा बना देना, — कि मेरे भीतर
**तुम्हारा प्रेम रहे, मेरा स्वार्थ नहीं।**
बस प्रेम हो…
निर्मल, निःस्वार्थ प्रेम।
अगर प्रेम से माँगी इस दुआ पर
तुम्हारा भी मन पिघल जाए… तो ..
**तथास्तु कह देना, शिवा। Plz** 🙏